धन और सम्मान से जुड़े योग समझने के लिए rajyog in kundali को जानना सबसे पहला कदम है। महर्षि पराशर के नियमों के अनुसार कुछ ग्रह-स्थितियां व्यक्ति को धनवान बनाने वाली मानी जाती हैं। नीचे दिए वीडियो में डॉ. आचार्य धर्मेन्द्र शास्त्री अपनी 30 दिन की वैदिक ज्योतिष सीरीज के पहले दिन ऐसे तीन बड़े राजयोग समझाते हैं।
rajyog in kundali क्या है और क्यों ज़रूरी है
कई लोग दिन-रात मेहनत करते हैं, फिर भी उनका बैंक बैलेंस वहीं का वहीं रहता है। वहीं कुछ लोग कम मेहनत में भी आगे निकल जाते हैं। आचार्य जी बताते हैं कि यह केवल किस्मत का खेल नहीं, बल्कि महर्षि पराशर के अनुसार कुंडली में बैठे ग्रहों का परिणाम है।
वैदिक ज्योतिष ग्रहों की एक सटीक गणितीय स्थिति का अध्ययन है। इसलिए वीडियो देखते समय अपनी जन्म कुंडली साथ रखें और खुद जांचें कि ये योग आपकी कुंडली में हैं या नहीं।
पहला योग: गजकेसरी योग
आचार्य जी इसे सबसे पहला और सबसे शक्तिशाली योग बताते हैं। गज यानी हाथी, जो शक्ति और समृद्धि का प्रतीक है, और केसरी यानी शेर, जो आत्मविश्वास और राज्य का प्रतीक है।
जब कुंडली में चंद्रमा से केंद्र में, यानी चंद्र से पहले, चौथे, सातवें या दसवें भाव में देवगुरु बृहस्पति बैठे हों, तब गजकेसरी योग बनता है। लेकिन इसके साथ एक शास्त्रीय शर्त भी जुड़ी है:
- गुरु और चंद्र, दोनों पर राहु या शनि जैसे किसी पापी ग्रह की दृष्टि नहीं होनी चाहिए।
- योग शुद्ध रूप से बनने पर ही इसका पूरा प्रभाव माना जाता है।
आचार्य जी के अनुसार जिनकी कुंडली में यह योग शुद्ध रूप से बनता है, उन्हें जीवन में धन, समाज में सम्मान और उच्च पद मिलने के प्रबल संकेत होते हैं। ऐसे लोगों के लिए कहा जाता है कि वे मिट्टी छू लें तो वह भी सोना बन जाती है।
दूसरा योग: पंच महापुरुष योग
वैदिक शास्त्रों में दूसरे महान योग को पंच महापुरुष योग कहा गया है। यह मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि से बनता है। इनमें से कोई भी एक ग्रह केंद्र भाव में अपनी स्वराशि या उच्च राशि में बैठा हो, तो यह योग बनता है।
परंपरागत ज्योतिष में इन पांचों के अलग-अलग नाम हैं:
- मंगल से रुचक योग
- बुध से भद्र योग
- गुरु से हंस योग
- शुक्र से मालव्य योग
- शनि से शश योग
वीडियो में आचार्य जी शनि का उदाहरण देते हैं। यदि शनि तुला, मकर या कुंभ राशि में केंद्र में बैठा हो तो शश योग बनता है। ऐसे व्यक्ति के पास जमीन, प्रॉपर्टी और धन की कमी नहीं रहती और वह शून्य से शुरू करके शिखर तक पहुंच सकता है।
तीसरा योग: नीच भंग राजयोग
यह योग उन लोगों के लिए आशा का संदेश है जिन्हें लगता है कि किस्मत साथ नहीं दे रही। कई बार कुंडली में कोई ग्रह नीच का होता है और लोग डर जाते हैं कि अब सब बिगड़ जाएगा।
आचार्य जी समझाते हैं कि यदि उस नीच ग्रह के साथ कोई उच्च ग्रह बैठा हो, या संबंधित स्वामी ग्रह केंद्र में हो, तो उसकी नीचता भंग हो जाती है। तब यही स्थिति नीच भंग राजयोग में बदल जाती है।
ऐसा व्यक्ति शुरुआती जीवन में काफी संघर्ष करता है और कई बार उसे लगता है कि सब खत्म हो गया। फिर अचानक उसका भाग्य चमकता है और वह बहुत आगे निकल जाता है। आचार्य जी इसे संघर्ष से सफलता का वैदिक नियम कहते हैं।
rajyog in kundali कब पूरा फल देता है
किसी योग का केवल बन जाना काफी नहीं है। आचार्य जी शास्त्रों के आधार पर बताते हैं कि योग का पूरा फल तभी मिलता है जब ग्रहों का बल अच्छा हो और उन पर किसी पीड़ित ग्रह या श्राप का साया न हो।
इसलिए rajyog in kundali परखते समय ग्रहों की स्थिति के साथ उनका बल और दृष्टि भी देखनी होती है। विस्तृत जानकारी के लिए संपूर्ण कुंडली रिपोर्ट एक उपयोगी शुरुआत हो सकती है।
rajyog in kundali होते हुए भी आर्थिक तंगी क्यों?
आचार्य जी एक जरूरी बात की ओर ध्यान दिलाते हैं। कई लोगों की कुंडली में गजकेसरी और पंच महापुरुष जैसे योग होते हैं, फिर भी वे आर्थिक तंगी और कर्ज से परेशान रहते हैं।
इसका कारण कुंडली में छिपा दरिद्र योग हो सकता है, जो राजयोग को फलित होने से रोकता है। यह कैसे बनता है और इसके वैदिक उपाय क्या हैं, यह सीरीज के अगले वीडियो का विषय है। तब तक आप हमारा दरिद्र योग पर लेख पढ़ सकते हैं।
अपनी कुंडली का व्यक्तिगत विश्लेषण
अगर आप जानना चाहते हैं कि आपकी कुंडली में कौन सा राजयोग छिपा है या सफलता में रुकावट क्यों आ रही है, तो अनुभवी ज्योतिषी से कुंडली दिखाना बेहतर है। आप आचार्य जी से व्यक्तिगत परामर्श बुक कर सकते हैं या 9931974600 पर WhatsApp कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
जब चंद्रमा से पहले, चौथे, सातवें या दसवें भाव में बृहस्पति बैठे हों, तब गजकेसरी योग बनता है। आचार्य जी के अनुसार गुरु और चंद्र पर राहु या शनि जैसे पापी ग्रह की दृष्टि नहीं होनी चाहिए।
यह मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि से बनता है। इनमें से कोई ग्रह केंद्र में अपनी स्वराशि या उच्च राशि में हो तो यह योग बनता है।
नहीं, यदि नीच ग्रह के साथ कोई उच्च ग्रह बैठा हो या संबंधित स्वामी ग्रह केंद्र में हो, तो नीचता भंग हो जाती है। ऐसी स्थिति नीच भंग राजयोग बनाती है, जिसमें संघर्ष के बाद सफलता मिलती है।
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