शरद पूर्णिमा को वर्ष की सबसे सुंदर पूर्णिमा माना जाता है, और शरद पूर्णिमा खीर की परंपरा इसी रात से जुड़ी है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी चाँदनी में अमृत के गुण होते हैं।
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शरद पूर्णिमा खीर रखने की परंपरा
- गाय के दूध, चावल और मिश्री से खीर बनाएँ।
- खीर को साफ बर्तन में जालीदार कपड़े से ढककर रात में खुले आसमान के नीचे चाँदनी में रखें।
- अगली सुबह भगवान को भोग लगाकर परिवार के साथ प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।
कोजागरी लक्ष्मी पूजा
इस रात माँ लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। मान्यता है कि माँ लक्ष्मी पूछती हैं “को जागर्ति?” यानी कौन जाग रहा है, और जागरण करने वालों पर कृपा करती हैं।
इस दिन चंद्र देव को अर्घ्य देना और “ॐ सों सोमाय नमः” मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।
चाँदनी में खीर रखने का कारण
धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चाँदनी में अमृत के गुण होते हैं, इसलिए रात भर चाँदनी में रखी खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। आयुर्वेद में शरद ऋतु को पित्त बढ़ने का समय माना जाता है, और दूध-चावल की ठंडी खीर पित्त को शांत करने वाली मानी जाती है। इसी कारण यह परंपरा आस्था के साथ-साथ स्वास्थ्य से भी जुड़ी मानी जाती है।
शरद पूर्णिमा खीर बनाते समय ध्यान रखें
- खीर को चाँदी, काँसे या मिट्टी के साफ बर्तन में रखें; प्लास्टिक के बर्तन से बचें।
- बर्तन को जालीदार कपड़े से ढकें, ताकि चाँदनी पहुँचे और धूल या कीड़े न गिरें।
- सुबह खीर में तुलसी दल डालकर भगवान को भोग लगाएँ, फिर प्रसाद बाँटें।
- आसमान में बादल हों तो भी खीर को आँगन, छत या खिड़की पर चंद्रमा की दिशा में रखें।
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